भूली-बिसरी यादें

भूली-बिसरी यादें

sitting person smiling beside man sitting on brown concrete pavement while carrying baskets on his left shoulder

देखो ये गांव जो कभी अपना था 
ये भी कभी खुशनुमा हुआ करता था
ये बाग जो उजड़ा-उजड़ा सा है अब
यहां कभी कोयल अपनी धुन सुनाती थी। 

वो सूखे पीपल से मिले हो आते वक़्त क्या 
जो राहगीरों को ठंडी छाँव देता था
कच्ची सी वो मिट्टी की सड़कें 
अंधेरे में भी रास्ता दिखाती थीं। 

वो झील हमारी छोटी सी जमुना
जो अपनी वजूद के लिए लड़ रही अब
इक वक़्त था इसके जिंदादिल होने का
हर शख्स की प्यास यही बुझाती थी। 

गांव का वो बूढ़ा चौकीदार
जो सारी रात चिल्ला के जगाया करता था
वो मुंडेर पे रहने वाली कबूतर की टोली
होते सबेरे हमको जगाती थी। 

ये दूर तलक जो उदासी  जो देखी तुमने
ये कभी गुलजार हुआ करता था
कभी बाजरे की होती थी खेती 
कभी दिन भर सरसों लहलहाती थी। 

क्या देख रहे हो ढहते से ये मकान
इसमें कभी दादाजी रहा करते थे
किलकारियां गूंजी थी हमारी भी यहीं कभी
इसी जमीं पर मेरी बचपन मुस्कुराती थी। 

ये  चौराहे की बंद पड़ी गुमटी
कभी  शॉपिंग माल था हमारा
हर शाम चवन्नी सिक्कों के साथ 
मेरी बहन मुझे लेकर आती थी। 

वो देख रहे क्या डिबिया मिट्टी तेल का
टूटी फूटी कबाड़ में जा रही है अब
यही कभी दूर करता था अंधियारा
जो खुद जल के हमको पढ़ाती थी। 

ये कोने में बड़ी सी बिल्डिंग का प्लॉट
हरे-भरे घास का मैदान था कभी
दशहरे में महीने भर का मेला
मोहब्ब्त की झूले में हमको झुलाती थी। 

जाने कहा गई वो रौनक मेरे गाँव की
अब तो सब बदला बदला सा  लगता है
मुसाफ़िर सा हो गया हूँ जहां के लिए
कभी जो मुझको बेटा बुलाती थी। 
© Tukbook

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