रूठना महबूब का
आहिस्ता-आहिस्ता वो बंधन छूट गई
अब तो मिलन की आस तक ना रही
जो दिया तकदीर ने उसे भी ना संजो सका
ये बेचारी किस्मत ही फुट गई।
जाने लगी नजर किसकी
किसका बुरा साया पड़ा
वो सात जनम साथ निभाने वाली
महबूब हमसे रूठ गई।
माना होते हैं तकरार सनम
मोहबब्त का इक हिस्सा ये भी है
इश्क़ का रूह बचाते-बचाते
खुद की अस्मत लूट गई।
कसमें वादे हजारों जो किया था जालिम ने
इक दो भी उनको याद ना रहा क्या
ख्वाहिश थी बस होके रहेंगे हमारे वो
हर इक लब्ज़ उनकी झूठी हो गई।
© Tukbook
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
पूरा पढ़ लिया आपने ? हमें बताएं कि यह आपको कैसा लगा ?