कुछ यादें 🥺
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मैं पूरे शहर की हमदर्दी
को जोड़ने लगा हूँ,
मुझे भी किसी की जरुरत है,
पर मैं अब हर किसी का होने लगा हूँ,
मै ज़ीने का हूनर सिखने लगा हूँ,
जमीं में मोहब्बत बोने लगा हूँ,
अब इन ख्वाबो से डर नहीं लगता मुझे,
इसलिए अब जल्द ही सोने लगा हूँ,
और हंसी आती थी तुम्हारी बातों पे,
मगर अब बे-सबब सोचने लगा हूँ,
कल तक जो था हर
किसी के निगाहो मे गुंडा,
अब हर किसी के निगाहों
में बसने लगा हूँ,
समझाने का तरीका बदलने लगा हूँ,
मार-पिट नहीं, प्यार से
बातें करने लगा हूँ,
देख तेरे छोड़ के
जाने के बाद, जाना
मै कितना बदल गया हूँ,
तुम्हारी सहेली काजल,
प्रिया, गीता, मिले थे मुझे,
तुम्हारा हाल जानने के लिए,
मै हर इतवार तुम्हारी
सहेलियों से मिलने लगा हूँ,
मेरी खुद्दारीया थकने लगी हैँ,
मै तोहफे पा कर खूश होने लगा हूँ,
अब मै जीने का हूनर सिखने लगा हूँ...
अल्फाज़-ऐ-एज़ाज़
© Tukbook

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